आध्यात्मिकता और व्यक्तिगत विकास से जुड़े प्रश्नों के उत्तर "सवाल-जवाब" प्रारूप से ढूढ़ने में मिली मदद को कई पाठकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया के बाद इस बार हम प्रो. अनिल कुमार द्वारा लिखित लोकप्रिय "सत्योपनिषद" को क्रमबध्य कर रहे हैं ।
दो भागों में प्रकाशित इस पुस्तक में बुराई के मूल रूपों, मानव जीवन के लक्ष्य, अवतीर्ण एवं निराकार ईश्वर के स्वरूपों , महिला मुक्ति, शकाहारिता, पीढियों के बीच की दूरियों जैसे विषय पर दिव्य स्वरूप के साथ संवाद प्रस्तुत है ।
डॉ.हिस्लॉप की पुस्तक के विपरीत, इन संस्करणों में 270 सवालों को स्पष्ट रूप से वर्गीकृत किया है और अध्याय में तीन भागों के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है । हम इस भाग में पहले अध्याय के पहले भाग "अनन्त भारत" के साथ आरम्भ करते है ।
अध्याय 1 - अनन्त भारत
प्रो अनिल कुमार (एके ): स्वामी! भारत धर्म और आध्यात्मिकता का देश है. सभी अवतार भारत में जन्म लेते है. इसके पीछे क्या कारण है?
भगवान : भारत योगभूमि, आध्यात्मिकता का देश है । भारत पुण्यभूमि, पवित्र भूमि है । भारत कर्मभूमि, पवित्र गतिविधियों का देश है ।
भारत त्यागभूमि, त्याग की भूमि है । यहाँ साधु, संत, महात्मा, आकांक्षी, जरूरतमंद और भक्त भगवान से उनकी निकटता का आनन्द पाने के लिए प्रार्थना करते हैं ।यही
मनुष्य या अवतार के रूप में भगवान का अवतरण को आवश्यक बनाती है । उनकी उत्कट अपील और प्रार्थना के प्रतिक्रिया में भगवान कृपा और दया के साथ पृथ्वी पर हमारे बीच विचरण करते हैं ।
यह एक उदाहरण है । तुम पूछे क्यों हमेशा अकेला भारत ही अवतार का जन्मस्थान है । क्या आप जानते है कि ट्रेन से सामने स्थित इंजन के साथ कई वाहन जुड़कर रहते हैं। इंजन में उत्पन्न शक्ति या ऊर्जा वहां को आगे खींचती है ।
तुम ड्राइवर को कहाँ पाओगे ? स्वाभाविक रूप से, वह इंजन की ट्रेन की इंजिन में बैठकर उसका संचालन करता है, है की नही? इसी तरह, विश्व के ट्रेन में, भारत एक इंजन की स्थिति में है और अन्य देश वहां के रूप में इससे जुड़े हैं ।
परमेश्वर ही ड्राइवर है। इंजन उनकी जगह है। बस इसी रूप में हमें वहाँ गर्मी और शक्ति मिलती है। जैसे हमें वहां उत्पन्न उर्जा और शक्ति प्राप्त होती है वही तत्व हमें यजन और यगास(बलिदान) जैसे पवित्र संस्कारों के परिणाम स्वरूप समय समय पर भारत भूमि में प्राप्त होता है ।
हम महाकाव्य महाभारत में सदा अर्जुन और भीम को युधिस्ठिर का अनुसरण करते हुए पाते हैं। जहाँ अर्जुन बुद्धिमकता का प्रतिक है वहीँ भीम शाररिक शक्ति का। भारत युधिस्ठिर के स्थान पर है, अमेरिका अर्जुन और रूस भीम के स्थान पर । जैसे भीम और अर्जुन युधिस्धिर के आज्ञा का पालन करते थे वैसे ही अमेरिका और रूस भारत का अनुसरण करते हैं ।
"भारत" (तेलुगु में लिखित) में हम तीन अक्षर पाते हैं। प्रथम अक्षर भा भाव को दर्शाता है द्वितीय अक्षर र राग, धुन या लय का अभिव्यंजक है और तीसरा त ताल को दर्शाता है। इस प्रकार भारत वह देश है जहाँ ईश्वर की महिमा का गुणगान सही भाव, माधुर्य और सही लय के साथ गाया जाता है। इस देश का एक और नाम "हिन्दुदेशम" है। जिसका अर्थ ऐसा देश जो हिंसा से दूर है , 'हिम' अर्थात हिमसा या हिंसा और 'दू' 'दूरा' को दर्शाता है। इन्ही कारणों के लिए ही भगवान ने मानव रूप में अवतार के लिए भारत को चुना है।
ए के : स्वामी ! हम हर धर्म के लोगों को एक विशेष पथ और पाठ का अनुशरण करते हुए पाते हैं। लेकिन सनातन धर्म (प्राचीन भारतीय पद्धति में) में हमें कई पथ, ग्रन्थ और प्रक्रियाएं जैसे द्वैतवाद, योग्य अद्वैतवाद और अद्वैतवाद, छः दर्शन, चार वेद, अनेक शास्त्र (धर्मग्रन्थ) आदि मिलते हैं । कैसे हम इनको समझने के लिए सनातन धर्म के सिद्धांतों का अभ्यास करें?
भगवान:सनातन धर्म जीवन का सबसे प्राचीन आध्यात्मिक तरीका है । इसकी विविधता मानव व्यवहार की प्रवृत्ति के स्पेक्ट्रम, स्वभाव और मानसिक दृष्टिकोण से मेल खाता है।यह व्यावहारिक है और दिव्य अनुभव प्रदान करता है ।
एक छोटा सा उदाहरण। तुम कपड़े का एक टुकडा खरीदकर दर्जी को अपने लिए एक सूट बनाने को देते हो। दर्जी सूट आपके नाप के अनुसार तैयार करता है , क्या वह ऐसा नही करता ? तुम किसी और के लिए बने ड्रेस को पहन नही सकते । यह बहुत तंग या ढीला, बहुत लंबा या छोटा हो सकता है। इसलिए, आपके कपड़े आपके आकार के अनुसार होना चाहिए । उसी प्रकार कोई राम,कोई कृष्ण या शिवा हो सकते हैं। आपको अपने आस्था के अनुसार उन्हें चुनना होगा, वहीँ हर एक अनुयायी को अपने आकर के अनुसार से ड्रेस पहनना होगा।
एक और उदाहरण : शायद तुमने नादेश्वरम के बारे में सुना होगा (दक्षिण भारतीय संगीत वाद्य यन्त्र जिसे हर शुभ अवसर पर उपयोग में लाया जाता है)। लय को एक संगत बनाये रखने के लिए , एक व्यक्ति एक उपकरण को बाकी औरों कि तरह बजाता है । वहीँ दूसरी ओर, नादस्वरम से आप कितनी भी संख्या में राग या धुनों को बजा सकते हैं । सनातन धर्म नादस्वरम की तरह है ।
एक और उदाहरण : विज्ञान के अंडर-ग्रेजुएट कोर्स के दौरान आपके द्वारा लिए गए वैकल्पिक विषयों ला समायोजन जो भी हो, लेकिन 'M.P.C.' (गणित, भौतिकी और रसायन विज्ञान) या 'C.B.Z.' (रसायन विज्ञान, वनस्पति विज्ञान और जूलोजी) के जैसा होना चाहिए । जिससे तुम्हे एक B.Sc. कि उपाधि मिलती है । इसी प्रकार, साधु व्यास द्वारा स्थापित इस विश्वविद्यालय में आप किसी भी तरह के पाठ्यक्रम जैसे शास्त्र , उपनिषद् , वेद् विकल्प के रूप में चुन सकते हैं । यही हमारे प्राचीन सनातन धर्म का महत्व है जो आपको चयन करने के लिए और पालन करने का पर्याप्त आजादी देता है ।
यहाँ पर एक और उदाहरण है : एक फार्मासिस्ट और एक कैफे के मालिक को एक ही दिन सिर में दर्द होता है । राहत पाने के लिये कैफे का मालिक गोली के लिये मेडिकल की दुकान जाता है वहीँ फार्मासिस्ट कैफे से जाकर कॉफी का प्याला लेता है । ऐसा इसलिए, क्युकि एक को गोली में विश्वास है जबकि दुसरे को एक कप कॉफी पर भरोसा है । इसी तरह, आपको आध्यात्मिक पथ का अनुसरण करना चाहिए जिसमे आपका विश्वास हो और जिसका मूल पाठ ठोस हो और आपके लिये अपीलकरी हो ।
अ.कु.:स्वामी! मुसलमानों को हर शुक्रवार मस्जिद में (नमाज) प्रार्थना करने के लिए जाते हैं, और ईसाइयों को हर रविवार को चर्च में जाना पड़ता है । फिर, यह कैसे होता है कि हिंदुओं को अन्य धार्मिक समूहों की तरह एक मंदिर में जाकर नही मिलना होता है ?
भगवान :अगर आपको लगता है कि हिंदुओं को ऐसा करना चाहिए तो आप गलत हैं । उनके लिए ऐसा करना आवश्यक नहीं हैं विशेष रूप से दूसरों की तरह एक विशेष दिन पर मिलना । क्यों? हर हिंदु के घर में एक पूजा कमरा होता है या तो घर में एक वेदी होती है जिसकी विशेष रूप से पूजा की जाती है । वहाँ वे हर दिन प्रार्थना करते हैं । तो उन्हें इसकी कोई ज़रूरत नहीं है कि वो सामूहिक प्रार्थना के लिए इकट्ठा हों या दूसरे धर्मों से सम्बंधित लोगों कि तरह विशिष्ट दिन पर प्रार्थना करें ।
अ.कु.: स्वामी! चूंकि भगवान सर्वव्यापक और सर्वज्ञ हैं । क्या हमें मंदिरों की आवश्यकता होनी चाहिए और क्या हमें शिर्डी, पुट्टपर्ती, तिरूपति जैसे पवित्र स्थानों के लिए तीर्थ यात्रा पर जाना चाहिए या ऐसा कुछ करना चाहिए?
भगवान :यह सवाल मूर्खतापूर्ण है । तुम अपनी अज्ञानता का प्रदर्शन कर रहे हो । तुम्हारी ये फैशन वाली सोच जो कई बार ना के बराबर होती है ये बिगड़ी हुई सोच है । कुछ कहने और अनुभव करने के बीच कोई रिश्ता नही है । तुम्हें पता है कि भगवान हर जगह है ।
लेकिन यह केवल एक मुखर और मौखिक, अभिव्यक्ति है । क्या आपको सच में इसका पक्का विश्वास है कि भगवान हर जगह मौजूद है? क्या आपने कभी इस दिव्यता का अनुभव किया है जो व्यापक है ? आप केवल एक तोते की तरह बोल रहे हैं ।
यहाँ एक सरल उदाहरण है । एक गाय के पुरे शरीर में रक्त प्रसारित होती है लेकिन आप उसके थन से केवन दूध बाहर निकाल सकते हैं ! आप गाय का कान मोड़कर या पूंछ निचोड़ दूध प्राप्त नही कर सकते हैं क्या आप ऐसा कर सकते हैं ? इसलिए, सभी सर्वव्यापी भगवान की कल्पना और अनुभव मंदिर में और पवित्र तीर्थ स्थल में की जा सकती है ।
अ.कु.: स्वामी! क्यों प्राचीन ऋषि , साधु और संतों ने तपस्या के लिए जंगलों को चुना ? क्यों उन्होनें एकांत पसंद किया?
भगवान: निस्संदेह इसका महत्व है । क्यों उन्होनें तपस्या के लिए जंगलों का चयन किया ? यहाँ एक उदाहरण है - मान लो एक नगर में एक प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है । स्वाभाविक रूप से वंहा के स्टाल व वहाँ बिक्री के लिए रखे लेख आप को आकर्षित करते हैं । संगीत, खाद्य, कपड़े, आदि तुम्हें आकर्षित करते हैं । जब यह तुम्हारे सामने प्रर्दशित होता है तो तो वह तुम्हे आकर्षित कर लेता है । लेकिन, वहाँ वन में आकर्षित करने के लिए या आपका ध्यान विचलित करने के लिए कुछ भी नहीं है ।
एकांत तुम्हारी आंतरिक शांति व परम शांति बनाए रखने में मदद करता है जो ध्यान के लिए जरूरी है । यह आध्यात्मिक जीवन के लिए एक अनुकूल वातावरण प्रदान करता है । इसलिए, साधु और संतों ने हमेशा जंगलों में तपस्या की । दूसरे शब्दों में, आत्मिक दृष्टी से "फॉरेस्ट" अर्थात "फॉर रेस्ट" ।
अ.कु.: स्वामी! हमें दो व्यक्तियों के बीच आपसी कलह और मतभेद के अलावा आपसी समझ नही मिल पाती है । आदमी और आदमी के बीच एकता या भाईचारे शायद ही दिखाई पड़ती है । इन सबका क्या कारण है?
भगवान:जब आप एकता और लोगों के बीच मतभेदों के बारे में सोचते हो तो एक बात वहाँ स्पष्ट रूप से पता चलती है । आज दो व्यक्तियों के बीच आपसी समझ मौजूद नहीं है । समझ का अभाव ही सभी संघर्ष, दुश्मनी, अंतरभाव का मुख्य कारण है ।
इसी कारण, लोग एक दुसरे के साथ समायोजित नहीं हो पाते हैं । समायोजन वहीं संभव है जहाँ आपसी समझ हो । लेकिन, आज आप विपरीत दिशा में आगे बढ़ रहे हैं । आप सोचते हैं कि पहले समायोजित(एडजस्ट) हो जायें फिर आपसी समझ स्थापित करेंगें । लेकिन, यह गलत है. लेकिन आपको आपसी समझ स्थापित करनी पड़ेगी फिर समायोजन (एडजस्टमेंट) आसान हो जाएगा ।
यहाँ एक छोटा सा चित्रण है । जब आपके और आपके पत्नी के बीच सही समझ होती है तब आपके घर देर से पत्नी मन ख़राब नही करती । वह आपके साथ सुहानुभूति रखती हैं । वह आपकी चिंता करते हुए प्यार के साथ एक कप कॉफी लाती है । लेकिन अगर गलती से वहाँ कुछ गलतफहमी हो जाए और आपको ऑफिस से वापसी में पाँच मिनट की भी देर हो जाए तो वहाँ घर में एक सिविल वार हो जाता है ।
क्यों? आपकी समायोजन स्थापित करने में अक्षमता गलतफहमी का कारण है । इससे वह कई तरह के सवाल करने लगती है जैसे : "आप अब तक कहाँ थे? आप कहाँ गये थे? किसके साथ आपने अपना समय व्यतित किया?" आदि । तो आपसी समझ उचित समायोजन के लिए अत्यंत आवश्यक है । यदि यह एहसास हो जाए तो समाज के कई समस्याओं को सुलझया जा सकता है ।
अ.कु.: स्वामी! हिंदू पेड़ों, मूर्तियों आदि का उपयोग पूजा के लिए करने का आलोचना कर रहे हैं । उन्हें लगता है कि यह सब वहम और अंधविश्वास है । स्वामी इस बारे में आपको क्या लगता है ?
भगवान:भारत (इंडिया) दुनिया में आध्यात्मिक का केन्द्र है । यह वह देश है जिसने इस बात को प्रचलित, प्रचारित किया है की एक परमाणु से लेकर सम्पूर्ण ब्रह्मांड में सभी जीवित और अजीवित वस्तुओं में देवत्व मौजूद है । आपने यह नोटिस किया होगा की यह वह देश है जहाँ पुट्टा (चींटियों द्वारा बनाई गई एक छोटी पहाड़ी), गुट्टा (पर्वत), चेट्टू (पेड़) और पित्त (चिड़िया) पूजा की वस्तु है ।
चींटियों द्वारा बनाई गई एक छोटी पहाड़ी की पूजा भगवान सुब्रह्मन्य में रूप में, पक्षी को भगवान विष्णु का वाहन माना गया है, एक पर्वत की भगवान कृष्ण के द्वारा ग़ोवर्धन को उठाये जाने के रूप में आध्यात्मिक महत्व है और एक पेड़ की पूजा अष्ठ वृक्षा के रूप में होती है । हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार सभी वस्तुओं में दिव्ययता है । यह अंधविश्वास नहीं है ।
यह किसी भी तरह का वहम या अन्धविश्वास नहीं है । सनातन धर्म हमें हर स्थान पर देवत्व दिखाना, महसूस कराना और अनुभव करना चाहता है । यह आध्यात्मिक मार्ग है । यह उच्चतम और महान अनुभव है ।
(शेष भाग अगले अंक में ...)
- साई स्मृति टीम
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