मेरे साई
डॉ. गायत्री राघवन के द्वारा
अनंतपुर स्थित श्री सत्य साई कालेज की पूर्व छात्रा डॉ. गायत्री ने वर्ष 1982-84 के मध्य यहाँ से इंटरमिडीयेट कि शिक्षा प्राप्त की। वर्तमान में, वह संयुक्त राज्य अमेरिका में एक दंत चिकित्सक के रूप में अभ्यास कर रही है। वह उस परिवार से आयी है जो 1960 में भगवान के संपर्क में आयी है। गायत्री बेथेस्डा साई केंद्र, मेरीलैंड, अमरीका की एक सक्रीय सदस्य है और हर साल वह दंत चिकित्सक के रूप में पुत्तापर्थी में जनरल हॉस्पिटल आती है, जहाँ उसके माता पिता और दादी माँ (सुप्रपथं कमालाम्मा) प्रशांति निलयम में निवास करते हैं। साथ ही वह बालविकास की एक प्रशिक्षित शिक्षक है और वॉशिंगटन डीसी क्षेत्र के कई केंद्रों में कक्षाएं लेती है।
मुझे कई बार स्वामी को अंतर्यामी भगवान के रूप में अनुभव करने का सबसे बड़ा सौभाग्य मिला है। हम सब बहुत ही भाग्यशाली हैं कि हमें भगवान के साथ रहने बातचीत करने का मौका मिला है। लेकिन, कभी कभी मानव होने के कारण हम उन्हें सिर्फ उपहार स्वरुप मन लेते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि उन्होनें ही हमें इस धरती पे लाया है और हमारी किस्मत लिखी है। हम अक्सर उनकी उपस्थिति तथा हमारे जीवन पर उनके प्रभाव जैसे मूर्खतापूर्ण प्रश्न करने लगते हैं।
प्यारे और अनन्त सारथी
उनसे मेरी पहली मुलाकात, मेरे माता पिता के अनुसार तब हुई जब मैं दो महीने की थी। हम एक बार बंबई की यात्रा पर गए थे और मेरे पिता ने वहाँ एक नयी कार खरीदी। जब हम नयी कार से वापस चेन्नई लौट रहे थे, मेरी माँ और स्वामी के एक उतकृष्ट भक्त साथ में थे तब वापस रास्ते में स्वामी को देखने की लालसा होने लगी। मेरे पिता वापस पर्ती तक नई गाड़ी ड्राइव करने में अनिच्छुक थे। उन्होंने माँ का सुझाव ये कहकर मना कर दिया कि कहा, कह रही मेरी मना कर दिया है कि नई कार पर्ती के पथरीले रास्ते में ख़राब हो जायेगा।
|
 |
दो वर्षीय डा. गायत्री राघवन, अपने माता पिता के साथ |
|
अंततः मेरी माँ के एक लम्बे अनुनय के किये जाने के बाद, वे इस यात्रा के लिए सहमत हुए। लेकिन विडंबना से जब हम राष्ट्रीय राजमार्ग की पक्की सड़कों, पर गाड़ी चला रहे थे, जहां गाड़ी थोड़ा बहुत परेशान करने लगी और आंध्र प्रदेश में एक छोटे से कस्बे काद्री के पास रूक गयी। लगातार काफी प्रयास के बावजूद गाड़ी का इंजन शुरू नहीं हुआ। मेरा माँ दिन ढलने के कारण चिंतित हो रही थी, विशेष रूप मेरे एक छोटे से शिशु के साथ में होने से वो लगातार स्वामी से प्रार्थना कर रही थी।
तभी एक ट्रक कार के पास रुकी और ड्राईवर ने मेरे पिता से पूछा कि कार चालू करने में किसी तरह की सहायता चाहिए? मेरे पिता ने शुरू में उस अजनबी इन्सान को चाबी देने में अनिच्छा दिखाई लेकिन इस भयानक स्थिति में उन्होंने उसे चाबी दे दी। चालक ने तुरंत इस समस्या को समाप्त का दिया और हमसे पूछा कि हम कहाँ जा रहे हैं। मेरे माता पिता ने उसे बताया कि हम पुत्तापर्ती जा रहे हैं। हमारी खुशी के लिए चालक ने स्वेच्छा से पुत्तापर्ती तक गाड़ी चलाने कि इच्छा जाहिर कि क्योकि हम इस क्षेत्र के लिए नए थे। यह एक सुखद आश्चर्य था और मेरे पिता ने ख़ुशी से उसे चालक की सीट लेने को कहा।
ट्रक चालक हमें मदद करने में अत्यधिक खुशी महसूस कर रहा था; उसने रास्ते में ही ट्रक को छोड़ दिया और पर्ती तक हम सभी का साथ दिया! पर्ती तक हमारी कार पथरीली कठिन रास्ते पे आसानी से चलने लगी राष्ट्रीय राजमार्ग पर ऐसा कठिनाइयों से भरे रास्ते पे बेहतर ढंग से चलना अपने आप में दिलचस्प था। मेरे पिता की खराब सड़कों के भय के उलझन अब गलत साबित हो रहे थे।
ट्रक चालक एक दिन की पर्ती यात्रा के दौरान साथ रहा इस दौरान वो हमें सहायता करते रहा। मेरी माँ उससे बार बार उसके ट्रक के बारे में पूछता रहा। उसने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ट्रक के बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं है इसके बजे हमें स्वामी के दर्शन का आनंद लेना चाहिए। उसके बाद जैसे ही हमने स्वामी को देखा, हम पूरी तरह से ट्रक चालक के बारे में भूल गए। दर्शन के बाद, जैसा कि हमने तैयारी करके रखी थी हम चेन्नई के लिए रवाना हुए, ट्रक ड्राइवर ने कहा कि वह चितूर(चेन्नई के समीप एक शहर ) तक हमारा साथ देगा।
मेरे माता पिता ने सहमति व्यक्त की और वह उस शहर हमारे साथ रहा। मेरे पिता ने उसे धन्यवाद दिया और उसे अलविदा कहा, और उसके वापस काद्री जाने के खर्चे को पूरी तरह से भूल गए। मेरी माँ तो, मेरी माँ ने मेरे पिताजी से उस चालक को खोजने तथा उसे हमारी कृतज्ञता की एक छोटी निशानी देने को कहा। मेरे पिता ने उसकी खोज की, लेकिन वह नहीं मिला।
पर्ती की हमारी अगली यात्रा के दौरान, हम बहुत ही भाग्यशाली थे जो हमें स्वामी के साथ एक साक्षात्कार का मौका मिला। साक्षात्कार के दौरान उन्होनें ये बातें की, "मैं आपका अंतर्यामी हूँ, आप के साथ रहने वाला; मैंने आपको यहाँ आपके प्रेम और प्रार्थना के कारण लाया है"। हमारे पूरी यात्रा के दौरान स्वामी ने ना केवल हमारा ध्यान रखा, बल्कि मेरे पिता की उस बात को भी गलत साबित कर दिया की नई गाड़ी को पर्ती की सड़कों पर चलाना ठीक नहीं होगा। साई सनातना सारथी हैं, वे हमारे जीवन के अनन्त सारथी हैं।
भगवान की असीम अनुकंपा उनके भक्तों की रक्षा के लिए कहीं भी और किसी भी समय आ सकती है, क्योकि वे समय और स्थान की सीमाओं से परे है। जब स्वामी चाहेंगे, कुछ भी हो सकता है। क्या कोई उन्हें गलत कभी भी गलत साबित कर सकते हैं?
”मैं आपको बहुत अच्छे से जानता हूँ!” - बाबा
एक दूसरी ख़ूबसूरत घटना जो उनके सर्व-भूत होने की अमिट घटना को दर्शाता है मेरे मन में बार बार आता है। जब मैं अनंतपुर में इंटर-मीडिएट का कोर्स कर रही थी जो ग्रेड 11 और 12 के बराबर होती है, मैं अपने अध्ययन अवकाश पर माँ और दादी के साथ पुट्टपर्ती गई थी। परीक्षा के नजदीक होने से मेरी माँ चाहती थी कि मै स्वामी से आशीर्वाद प्राप्त करूं। मैंने उसे बेसब्री से बताया,
“हे माँ, वे मुझे एक बच्चे के रूप में जानते हैं। लेकिन अब मैं लम्बी और बड़ी हो गयी हूँ, उन्हें कैसे पता चलेगा कि मैं कौन हूँ? कैसे कर सकते हैं वे मुझे पहचान कर कैसे आशीर्वाद देंगे?”
मेरी माँ ने तुरंत प्रतिक्रिया व्यक्त की, “बस मुझ पर भरोसा रखो, वो तुम्हें आशीर्वाद देंगे। मेरे लिए, क्यों ना तुम जाओ और उनसे आशीर्वाद ले लो, इससे तुम परीक्षा में अच्छा करोगी.”
जहाँ से स्वामी चल रहे थे मैं वहां से अनिच्छापूर्वक 6 या 7 पंक्ति दूर बैठ गयी और फिर आश्चर्य! स्वामी आचानक रूक गए मेरी और निहारकर देखा और मुझसे अपनी मीठी आवाज में बात की! “तुम गायत्री हो, ठीक? तुम सुप्रभातम कमलामा की पोती हो। मैं तुम्हें अच्छी तरह से जानता हूँ!” मै अचंभित थी लेकिन जल्दी ही मैंने अपने आपको सँभालते हुए कहा,“हाँ, स्वामी! मुझे अपनी परीक्षा के लिए आपके आशीर्वाद कि आवश्यकता है?” “चिंता मत करो, तुम परीक्षा में अच्छा करोगे ,” उन्होंने कहा और मुझे प्यार से आशीर्वाद देकर चले गए।
मैं इस अनुभव से काफी सहज हो गया। इस घटना से बस कुछ घंटे पहले, मैं अपने माता पिता से कहा कि वो मुझे कैसे पहचानेंगे और फिर उन्होनें मुझे अकेले कैसे आशीर्वाद देंगे। उन्होंने ने मुझे गलत साबित कर दिया है और एक अप्रत्याशित तरीके से मुझे आशीर्वाद दिया. स्वामी अंतर्यामी है. वह हमारे विचारों, हमारे कर्मों, और हमारे शब्दों से हर समय अवगत रहते हैं।
मेरे दिमाग में एक अन्य अवसर का विचार आता है जो इस भाव को मजबूत करता है कि हमें अनुकंपित करने वाले प्रभु हमारे निरंतर साथी है। मैं भगवान के अनंतपुर कॉलेज परिसर में थी। हमने सुना कि स्वामी हमारे कॉलेज के यात्रा पर आ सकते हैं इस दौरान हमें उनके सामने एक सांस्कृतिक का आयोजन करने की तैयारी करनी चाहिए। यह संक्रांति का समय था और आंध्र प्रदेश में यह बोम्मा कोलू बनाने का समय था, इस त्योहार के दौरान बनाई और खेली जाने वाली एक खिलौने और गुड़िया का प्रचलन था।
मुझे और मेरे कुछ दोस्त ने सोचा कि क्यों ना हम जीते जागते गुडियों का रूप तैयार करके हमारे प्रिय भगवान के लिए एक दिलचस्प विषय पर कार्यक्रम दें। मैं भी इस फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में एक प्रतिभागी थी और मैंने सब्जियों वाली एक सेट ड्रेस “सब्जी रानी” पहन रखी थी। जब मैं प्रदर्शनी वाले कमरे में गई तो मैंने हर किसी को ऐसे अद्भुत परिधान में पाया की मै आश्चर्य करने लगी और सोचने लगी कि मेरी पसंद सही है कि नहीं। मैंने सोचा कि शायद स्वामी मेरी साधारण दिखने वाली पोशाक पसंद नहीं करेंगे। मैंने अंतिम परिणाम के लिए फिर से अपने आपको तैयार किया और मेरे अन्तःमन ने मुझसे कहा कि कम से कम मै इतना भाग्यशाली तो हूँ कि स्वामी के दर्शन प्राप्त होंगे।
|
 |
 |
|
|
...with the lord with fancy dress on |
बिल्कुल मेरी सोच के विपरीत, स्वामी कमरे में आये और सीधे मेरी तरफ आये, मै तब यह सोच रही थी कि अगर मुझे प्रभु की एक झलक मिल जाये तो मैं भाग्यशाली होउंगी. बजाय इसके, हमारे प्यारे भगवान हमारी सरल प्रस्तुति से काफी खुश हुए और मुझसे बात करने में काफी समय बिताया. वे मेरे पोशाक से काफी उत्साहित हुए और मेरे चारों ओर लगे सब्जियों का वर्णन करने लगे. फिर उन्होनें फोटोग्राफर को मेरी एक तस्वीर उसके साथ लेने का इशारा किया ! कितने दयालु और प्यारे हैं हमारे साई ! वह सच में अंतर्यामी है सबकुछ जानने वाले, वह मेरी हर सोच को महसूस कर लेते हैं, इसके अलावा और कैसे मैं अपने सौभाग्य को समझा सकती हूँ ?
सबसे करीबी साथी
अंत में, कुछ समय पहले, 2002 में, मेरे पति सऊदी अरब में एक अनुबंध पर काम करने गए थे। इराक युद्ध का खतरा उस समय मंडरा रहा था, मैं बहुत असहज महसूस कर रही थी और उनके बारे में चिंतित थी क्युकि वे एक अमेरिकी नागरिक के रूप में सउदी अरब में रह रहे थे। मैंने उन्हें यह भी सलाह दी कि वह अपनी नौकरी छोड़ दे और अमेरिका या भारत में कुछ नया कम ढूंढ़ ले। इस अलगाव और उनकी सुरक्षा के बारे में चिंता के तनाव के कारण, मैं स्वामी से उनकी सुरक्षा के लिए हर रोज प्राथना करने लगी। इस अवसर पर मै काफी निराश महसूस करने लगी, मै अपने पति से कहती थी कि स्वामी को मेरे रोने की कोई परवाह नहीं है, वो अपने पति से कहा, वह लोक-कल्याणम् के लिए आये हैं अर्थात उन्हें दुनिया का कल्याण करना है सिर्फ मेरी नहीं
जिस दिन हमने यह बाते कही, उसी दिन मेरे पिता को स्वामी के साथ एक साक्षात्कार पाने का अद्भुत सुखद अनुभव प्राप्त हुआ। आश्चर्यजनक रूप से पहली बात जो स्वामी ने उनसे कही वह थी, “ आपकी बड़ी बेटी कैसी है ? आपके दामाद क्या करते है?” उन्होनें लगातार हमारे कल्याण के बारे में पूछना जारी रखा और अंत में कहा , “उससे कहना मै हमेशा उसके साथ हूँ.” जब पिता ने यह अनुभव बखान किया तो मेरी आंखों से अनियंत्रित रूप से आंसू बहने लगे।
इस तरह की माँ की ममता और पिता की चिंता केवल हमारे प्रिय भगवान ही कर सकते हैं, क्युकी वो अंतर्यामी हैं। हर बार जब भी मैंने उनसे मदद मांगी है स्वामी हमेशा मुझे मेरी माँ, पिता, एक करीबी रिश्तेदार और एक दोस्त के रूप में मिले हैं। भगवान हमेशा हमारे निकटतम साथी प्रण सखा (आत्मा साथी) हैं , और वे हमारे पास जीवन की इस कठिन यात्रा में हमेशा रहेंगे। मैं अपनी स्वामी के अनुभवों के इस यादगार छोटे संकलन को अपने मन में आ रहे स्वामी के एक प्रेरणादायक उद्धरण के साथ समाप्त करुँगी।
|
“इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कहाँ हैं, जैसा भी आपको मौका मिले अपना कर्तव्य करते जाओ।
इस बात को जानो कि मै आपके अन्दर हूँ और आपको हर कदम पर मार्गदर्शन करूँगा।
आप मेरे अपने हो, मेरे प्रिय से भी ज्यादा प्रिय।
मैं तुम्हें छोड़कर कभी नहीं जाऊंगा, और ना ही तुम मुझे छोड़कर जा सकते हो।
अब से तुम किसी भी लालसा में नहीं जाओगे।
सभी में भगवान का रूप देख कर अटूट प्रेम के साथ अपने कर्तव्य का पालन करो।
अपने होठों पर भगवान का नाम हमेशा रखो। ” |
प्रिय पाठक, क्या इस लेख ने आपको किसी भी तरह से प्रेरित किया? क्या आप हमारे साथ अपनी भावनाओं को बाँटना चाहेंगे? कृपया हमें लिखे admin@saismriti.org आपके विचार हमें प्रेरणा देंगे। आपके कीमती समय के लिए धन्यवाद।