पूर्व में डॉ. टी. रवि कुमार वृंदावन (बंगलोर) स्थित श्री सत्य साई कॉलेज में वर्ष 1974 में अपने मध्यवर्ती पाठ्यक्रम के लिए एक छात्र के रूप में शामिल हुए। उन्होंने आगे चलकर इसी कॉलेज से विज्ञान में स्नातक की शिक्षा पूरी की। बाद में मास्टर इन साइंस(रसायन विज्ञान) पूरी करने के बाद, 1981 में एक शिक्षक के में श्री सत्य साई कॉलेज में शामिल हो गए। उन्हें 1990 में श्री सत्य साई विश्वविद्यालय द्वारा रसायन शास्त्र में डॉक्टर ऑफ़ फिलोसोफी से सम्मानित किया गया। वर्तमान में, वे इसी विश्वविद्यालय के वृंदावन परिसर में रसायन विज्ञान विभाग में रीडर है। इसके अलावा, वह एक प्रतिभाशाली वक्ता और श्री सत्य साई साहित्य के उच्च छात्र है।
मेरे जीवन का सबसे सुखद और दुखद दिन एक ही दिन 15 सितम्बर 1963 को आया। मेरी उम्र सिर्फ साढ़े चार की थी जब मेरी माँ उस दिन चल बसी। शाम के समय जब जब उनकी शरीर को दह संस्कार ले जाने लगे मेरे चचेरे भाई जो मेरे से उम्र में थोड़े बड़े थे ने मेरे कान में फुसफुसाया कि मेरी माँ को शोभायात्रा के द्वारा ले जाया जायेगा। इस बात ने मुझे थोड़ा खुश कर दिया क्युकि मैंने सोचा ये मंदिर के शोभायात्रा जैसे होगा। मेरे छोटे से दिमाग में इस धार्मिक यात्रा के बारे में जो भी छवि बनी उससे हर्ष का माहोल बन आया।
लेकिन जब मेरे भाई ने कहा "....वो अब वापस नहीं आएगी" मुझे दुखों ने घेर लिया। मुझे शांत करने की सारी कोशीशें बेकार गई, इसलिए मुझे सड़क के उस पार मेरे चाची के घर ले जाया गया जहाँ मेरा ध्यान बंट जाये। मेरी चाची स्वामी की भक्त थी, इसलिए उनके घर में सामने वाले कमरे में स्वामी की सुन्दर फोटो लगी थी। मैंने उसे देखते ही उनसे पूछा कि ये कौन हैं?
और उन्होंने कहा "ये भगवान हैं। स्वामी से प्रार्थना करो वो तुम्हारी रक्षा करेंगे"। थोड़ी देर में मैंने पाया कि दिव्य माता की करुणामय आँखें मुझे देख रही थी, और तब जब मेरी वास्तविक माँ की आँखे बंद हो गई थी। और इस घटना के बाद मै कह सकता हूँ मेरा जीवन पहले जैसा नहीं रह गया।
ये 1968 की बात है जब मेरे पिता के कैंसर को स्वामी ने सर्फ़ यह कह के ठीक कर दिया था “आपका कैंसर केंसल (खत्म) किया जाता है”। पिताजी इसके बाद 38 साल तक जीवित रहे, कुछ साल पहले ही उनकी बुढ़ापे में मृत्यु हुई। वो अपनी अंतिम साँस तक कार्य करते रहे।
मेरे परिवार और मुझे हमेशा लगता है कि ये 1968 में मेरे पिता को कैंसर से बचाने के चमत्कार के बाद ही हमें भगवान बाबा के चरणों में रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ लेकिन प्रिय भगवान ने बहुत जल्द ही हमारे इस गलत विचार को खत्म कर दिया!
एक दिन जब मुझे उनके सम्मुख बोलने का आशीर्वाद प्राप्त हुआ, मैंने यह बताया कि कैसे मै और मेरा परिवार स्वामी के संपर्क में आये। लेकिन सर्वज्ञ भगवान ने इसे ठीक करते हुए कहा “1968 नहीं, 1963”.
स्वामी ने आगे कहा “तुम्हे याद है वो दिन जब तुम्हारी माता कि मृत्यु हुई? मेरी फोटो देखके क्या तुमने अपनी चाची से नहीं पूछा था 'चाची ये कौन हैं?' उस दिन से मै तुम्हारे साथ हूँ ”। और साई माँ के मार्गदर्शन से भरा ये सफर कितना रोमांचक है! स्वामी माँ हैं, और मेरे लिए माँ से भी बढकर!
एक दिन जब मुझे उनके सम्मुख बोलने का आशीर्वाद प्राप्त हुआ, मैंने यह बताया कि कैसे मै और मेरा परिवार स्वामी के संपर्क में आये। लेकिन सर्वज्ञ भगवान ने इसे ठीक करते हुए कहा "1968 नहीं, 1963"। स्वामी ने आगे कहा "तुम्हे याद है वो दिन जब तुम्हारी माता कि मृत्यु हुई?मेरी फोटो देखके क्या तुमने अपनी चाची से नहीं पूछा था 'चाची ये कौन हैं?' उस दिन से मै तुम्हारे साथ हूँ"।
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किशोरावस्था के रोमांच
जब यह बात पता चली कि मेरे पिता को कैंसर है, हमारा काफी समय पुट्टपर्ति आने जाने में बीता। क्युकि उन्होंने यह सोचा ही नहीं था कि वे कैंसर से बच पाएंगे, पुट्टपर्ति से लौटके जब वो ऑफिस गए तब उन्होंने पाया कि उनके कई सहकर्मी जिसमे से कई उनके जुनियर थे की पदोंन्नती प्राप्त कर चुके थे। इसका अर्थ यह था कि मेरे पिता को अपने खोये हुए समय और मौके को पाने के लिए अधिक मेहनत करनी थी।
उस समय मै हाई स्कुल में था और बुरे संगत में पड़ गया था। जिस स्कुल में मै पड़ता था उसके सामने तीन सिनेमा थियेटर थे , मै और मेरे दोस्त दोपहर में सिनेमा देखते हुए अपना समय बिताते थे। सप्ताह में जितने दिन होते हैं उतने दिन फिल्म हम देखा करते थे यहाँ तक कि हम रविवार की सुबह भी फिल्म देखने जाते थे जो छुट्टी का दिन होता था!
‘गुड बॉय’ से 'गाड’स बॉय' तक
एक रविवार, मेरा परिवार और मै ब्रिन्दावन स्वामी के दर्शन के लिए गए और स्वामी ने हमें इंटरव्यू के लिए बुला लिया। सामान्यतः सभी इस आशीर्वाद के लिए तत्पर रहते हैं। आपको सिर्फ इसके लिए चुने गए भक्तो का चेहरे देखने की जरूरत हैं आपको इसका अर्थ पता चल जायेगा।
हालाँकि जब हम इंटरविव रूम में जा रहे थे मेरे मन में कई तरह के विचार आ रहे थे। मेरे दिल में इस प्रतिष्ठित इंटरविव प्राप्त होने की ख़ुशी के साथ साथ थोडा सा दर भी बना हुआ था। स्वामी जब दर्शन से लौटते हुए जब समने से गुजरे तब उन्होंने मेरे गल पर थपथपाते हुए कहा “ गुड बॉय ”।
ऐसे में कोई भी व्यक्ति जिसे यह टिप्पणी मिल जाये उसे ऐसा लगता है जैसा उसे जीवन का उद्देश्य मिल गया और उत्साह और रोमांच से मन भर जाता है। लेकिन विश्वास कीजिये जो आनंद मैंने महसूस किया वह इसके मुकाबले यह कुछ भी नहीं है। इसके दो कारण थे: जहाँ एक ओर स्वामी ने प्रमाणित किया कि मै एक अच्छा लड़का हूँ जिसे मै अपने सिने पर लगा सकता हूँ। लेकिन दूसरी ओर इससे महाव्त्पूर्ण बात, यह काफी राहत देने वाली बात थी कि स्वामी ये नहीं जानते हैं कि मै अब तक कैसा था!
लेकिन, जल्द ही यह क्षण बीत गया, स्वामी ने मेरे पिता कि ओर देखा और एनी मित्र जो उनके साथ थे के बारे में पूछने लगे। जब यह बताया गया कि बाकि सब बाहर मैदान में हैं, स्वामी ने उन्हें उनको लाने को भेजा।
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Swami with the boys
(author to Swami's left)
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Swami with the erstwhile Sri Sathya Sai Arts and Science College (author in glasses to Swami's right) |
फिर वो मेरी ओर एक प्यारी सी मुस्कान से मुड़े और फिर कहा “गुड बॉय”. मेरे अन्दर एक मिली सेकण्ड तक ख़ुशी की लहर दौर पड़ी जब तक कि यह कथन एक सवाल नहीं बन गया “गुड बॉय?” मै अच्छे बच्चो कि तरह भोला-भाला बनने कि कोशिश करते रहा, लेकिन मुझसे पूछा गया: “कल दोपहर 2.30 बजे तुम कहाँ थे?".?” मै सीधा सा मुंह बनाते हुए विश्वास से बोला, " स्वामी, कल शनिवार था। निश्चित रूप से मै कक्षा में रहा होऊंगा....।
स्वामी ने वापस चुटकी लेते हुए कहा, “" बिलकुल सही। तुम्हे वही होना चाहिए..... लेकिन तुम थे कहाँ?” (अब मुझे अहसास हुआ कि सवाल मुश्किल होता जा रहा है और मैंने चुप रहने का फैसला लिया)। स्वामी ने आगे कहा , “मै बताऊ? तुम अजंता थियेटर में अंतिम से तीसरे पंक्ति में अपने मित्र जी और पी में बीच में बैठे कटी पतंग फिल्म देख रहे थे”।
स्वामी ने वापस चुटकी लेते हुए कहा, " बिलकुल सही। तुम्हे वही होना चाहिए..... लेकिन तुम थे कहाँ?" (अब मुझे अहसास हुआ कि सवाल मुश्किल होता जा रहा है और मैंने चुप रहने का फैसला लिया)। स्वामी ने आगे कहा , "मै बताऊ? तुम अजंता थियेटर में अंतिम से तीसरे पंक्ति में अपने मित्र जी और पी में बीच में बैठे कटी पतंग फिल्म देख रहे थे"(कटी पतंग एक हिंदी फिल्म का नाम है) |
यह मेरे जीवन का तब तक का सबसे सटीक वर्णन था! स्वामी की आवाज धीमी पद गयी जब मैंने अपनी आँखों के कोने में देखा कि मेरे पिता अपने दोस्तों के साथ आ रहे हैं। मुझे कंपकपाते हुए एहसास हुआ कि एक से अधिक प्रकार से यह मेरे जीवन का लाल दिन बन जायेगा। स्वामी शायद मुझे दूसरी बार बेनकाब करेंगे और मेरे पिता मुझे सज़ा देंगे .... मेरे पिता का इस पर कड़ा विश्वास था कि 'ख़राब बच्चे के लिए छड़ी खाली नहीं छोडनी चाहिए। " लेकिन आगे जो हुआ उसने मुझे अन्दर से बदल दिया! मेरे पिता से इसके सब खुलासा करने के बजाय, सबसे प्यारी मुस्कान के साथ साई मां ने कहा, “वह एक अच्छा लड़का है। मैं उसे अच्छे संगती में रहने का सलाह दिया है। ”
मै शब्दों कि अभिव्यक्त से परे चला गया। मैंने अपने आपसे पूछा, " क्या इस दुनिया में कोई और हो सकता है जो इतना दयालु होगा, जबकि यह आपके बारे में सब जानता है? मेरे कई कमियों के बाद भी कौन मुझे इतना प्यार कर सकता है, इतनी मदद कर सकता है?"
मेरा तर्क है कि स्वामी इस घटना का इस्तेमाल मेरे पिता व अन्य के सामने अपनी सर्वव्यापकता बताने के लिए कर सकते थे, लेकिन उन्होंने मुझे बचाने के बारे में सोचा। इस घटना के बाद मैंने निर्णय लिया कि मै इस माँ को पुरे दिल से प्यार करूँगा और जीवन भर उनके चरण कमल कि सेवा करूँगा!
इस घटना ने सच में मेरे जीवन में एक नई शुरुआत को जन्म दिया: एक नए पत्ते का जन्म हुआ। लेकिन किस बात ने इसे और भी बेहतर बना दिया, जब स्कूल शिक्षा के बाद स्वामी ने श्री सत्य साई कोलेज में आगे कि कक्षा (XI and XII) के लिए चुनकर अमूल्य विशेषाधिकार दिया।
मतलब मै स्वामी से निकटता का आनंद ले सकता था और दिव्य उपस्थिति में बड़ा हो सकता था। यह 1974 कि बात है। लेकिन आज जब मै पीछे मुड़कर अपने जीवन को देखता हूँ, मै पता हूँ कि स्वामी ने कैसे जटिलता और प्यार से सोने के धागों से इसे बुना।
साक्षात् भगवान् के सम्मुख बड़ा होना...
सबसे निचली कक्षा में होना और वो भी सबसे छोटा, मेरे आत्मविश्वास को बढाने के लिए ज्यादा नहीं था। मैं चुपके से अपनी ऊंचाई में कुछ इंच जोड़ना चाहता था। एक सुबह, मेरे पहले साल में, वृंदावन में पोर्च के सामने खड़ा हुए स्वामी ने कहा, "सभी छोटे बच्चे सामने आ जाये" मैं यह देखकर आश्चर्य में था कि हम जैसे वहां 8 थे!
स्वामी ने वार्डन को बुलाया और उसे निर्देश दिया कि हम सभी को लम्बाई बढ़ाने वाली "दवाई" दी जाये! उन्होंने उसे एक बॉक्स दिया है और निर्देश दिए कि सुबह के समय गर्म दूध के साथ हमें हर रोज़ दिया जाएगा। वार्डन हमें अपने कार्यालय में ले गए, और एक अतिरिक्त सावधानी के रूप में हमारे उचाई को लिख लिया। अगली सुबह, जब हमें 'दवा' दी गई तब हम यह पाकर प्रसन्न हुए कि यह बहुत स्वादिष्ट और मीठा था। कितनी बार हमने "मीठी दवा" के बारे में सुना था? लेकिन जब दवा बनानेवाली दिव्य माँ हो, तो और यह कैसे हो सकता है?
पन्द्रह दिनों के बाद 'दवा' पूरी तरह से ख़त्म हो गयी थी। वार्डन अगले 'खुराक' के लिए स्वामी के पास गए। स्वामी ने सिर्फ इतना कहा, "इसकी कोई जरूरत नहीं है। ऊंचाई मापकर खुद ही देख लो। " और हां हम सभी लम्बे हो गए थे। ऊंचाई में कुछ इंच जुड़ गया था! मुझे जिस बात का बोध हुआ वह था कि यहाँ स्वामी की ध्यान से कुछ भी नहीं बच सकता हैं चाहे कितना छोटा हो, और ऐसा कुछ भी बड़ा नहीं जिसे वह अपने आशीर्वाद से पूरा नहीं कर सकते हैं।
प्रबल साई शक्ति
यह 1995 में 70वे जन्मदिन उत्सव के कुछ दिन बाद की घटना है। मै भजन हॉल में पहली पंक्ति में बैठा था। स्वामी में भक्तो के एक समूह को इंटरविव रूम में बुलाया।
मैं तमिल साहित्य "प्रिय पुराणं" का अंग्रेजी अनुवाद जो मेरी बहन ने कुछ दिन पहले मुझे दिया था पढ़ रहा था। यह थिरुग्नना सम्बंदर(एक बच्चा जो भगवान् शिव का भक्त था) की जीवन कहानी थी। विशेष रूप इस कहानी में, एक दिन, जब पिताजी को स्नान के लिए मंदिर की टंकी के पास जाना चाहते थे तब उस बच्चे ने जो सिर्फ कुछ साल आयु वर्ग का था ने भी साथ जाने के लिए जोर देने लगा।
उसका आवेग बढाने लगा और पिता बच्चे को मंदिर की टंकी के लिए ले जाने को मजबूर हो गया। टैंक बांध पर बच्चे को छोड़कर पिता नहाने के लिए चले गए। कुछ समय के बाद, बच्चा रोने लगा .......
इस समय, स्वामी इंटरविव कमरे से बाहर आए और मै जो किताब पढ़ रहा को देखने लगे। मैंने उनकी ओर देखा। स्वामी भजन हॉल में आये, गलियारे साथ चलते हुए और एक भक्त से बात करते हुए हॉल के अंत तक गए।
जब वह लौटे, उन्होंने मेरी आँखों में देखा और पूछा, “मुझे बताओ तुम्हे कितने लीटर दूध चाहिए?”मेरे दिमाग में जो पहला ख्याल आया वो था छह महीने पहले स्वामी ने मुझे वजन कम करने को कहा था और वास्तव में , यहां तक कि आइटम भी सूचीबद्ध कराया था जिनसे बचना होगा! क्या मै सही आहार लेने में असफल रहा? स्वामी ने एक ही सवाल तीन बार दोहराया और प्रश्न का आशय नहीं समझ पाने के कारण मैं चुपचाप रहा.
स्वामी के इंटरविव रूम में चले जाने के कुछ समय बाद तक यह प्रश्न मुझे परेशान कर रखा था.... 'उन्होंने मुझे यह सवाल क्यों पूछा?', मैं सोचने लगा। जब भी तीव्र प्रयास के बाद भी, जब मैं सवाल का मतलब नहीं समझ पाया, मैंने इसे समय पर छोड़ने का फैसला किया, अपने आप को दिलासा दिलाया कि स्वामी उपयुक्त समय आने पर सही अर्थ प्रकट कर देंगे, और वापस किताब पढ़ने लगा जहाँ से मैंने छोड़ा था:
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The author speaking before Swami during a Trayee session at Brindavan |
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'... .. बच्चा रोने लगता है। उसे भूख लगी थी। उसकी स्थिति देख, शिव और शक्ति बच्चे के सामने प्रकट हुए और दिव्य मां ने बच्चे को एक सुनहरी कटोरी में दूध दिया। जब पिता नहाकर लौटे, बच्चे के चेहरे पर दूध की बूँदें देखकर, उसने बच्चे से पूछा। छोटे बच्चे ने जो तब बमुश्किल तुतलाता था ने एक कविता के माध्यम से दिव्य जोड़े का वर्णन गाकर सुनाया.
आप मेरे स्थिती की कल्पना कर सकते हैं। मैंने किताब निचे रखी क्युकि आंसू से मेरी आँखे भर आई थी। मै ख़ुशी से भर उठा जब मुझे अहसास हुआ कि उन्ही शिव-शक्ति ने कुछ क्षण पहले वही प्रश्न मुझसे किया था!
मैंने यह भी महसूस किया कि यह वाही स्थान (भजन हॉल) है जहाँ 1963 में, गुरु पूर्णिमा के अवसर पर स्वामी ने घोषणा की थी वे शिव और शक्ति दोनों के अवतार हैं, और अपने आपको पक्षाघात से ठीक किया हैएक बच्चा होना और दिव्य माँ के प्रेम के आनंद का अनुभव करना सबसे बड़ा अनुभव है। एक बार त्रयी वृंदावन में, स्वामी एक नए छात्र जो उसी दिन आया था और घर की याद आने से रो रहा था को सांत्वना दे रहे थे। उन्होंने कहा, “मैं तुम्हारी अपनी माँ की तरह बहुत अच्छी तरह से देखभाल करूँगा ... यहाँ रवि से पूछो, वह जानता है। ”.
एक प्रसिद्ध उद्धरण है जिसमे कहा गया है, "हाथ जो चट्टानों को पालते हैं, वो दुनिया पर राज करते हैं" दुनिया में कल के नागरिकों को आकार देने में माँ की भूमिका को दर्शाता है। हम सभी कितने भाग्यशाली हैं, 'हाथ जो दुनिया को संचालित करते हैं, हमें पालते हैं!"
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