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प्रशांति निलयम में आज लिखित
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Tuesday , Feb 07, 2012 |
ऐसा सोचना कि भगवान् आपसे दूर या अलग हैं ये परोक्ष या अप्रत्यक्ष ज्ञान है। ऐसा सोचना कि ईश्वर जो ब्रह्मांड में अंतनिर्हित है आप में है, आत्मा के रूप में है अपरोक्ष या प्रत्यक्ष ज्ञान अनुभव है। यदि सारे कार समर्पणात्मक भावना से किया जाये तो चित्त (आंतरिक चेतना) शुद्ध की जा सकती है। भगवान् कृष्ण ने कहा है केवल ऐसे लोग ही भगवान के जन्म और कर्म की दिव्य प्रकृति की पहचान कर सकते हैं। सब ऐसा दिव्य पहचान नहीं कर सकते हैं। आज तक कोई दिव्यता के संपर्क में आने से बच पाया है। यह भी याद रखना चाहिए कि दुष्ट को सजा देना भी दिव्य मिशन का हिस्सा है।जो सीमाएं लांघ कर अकर्म, अन्याय और अनाचार (अनैतिकता) में लिप्त होते है और अहंकार भाव से घिर जाते हैं उन्हें दंड मिलता है। आप मिले हर मौके का उपयोग अच्छा बनाने और अच्छा करने में करना चाहिए। आपकी ओर से कोई चूक नहीं होना चाहिए। ~ बाबा |
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