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प्रशांति निलयम में आज लिखित
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Friday , Sep 03, 2010 |
ईश्वर ही आधार हैं और वही संरचना भी हैं। मोतियाँ अनेक होती हैं लेकिन उन्हें पिरोने वाली तार एक ही होती है. इसी प्रकार, दुनिया में सभी जीवित वस्तुओ के लिए स्थायी, सर्वव्यापक परब्रम्ह ईश्वर आधार हैं। "सोऽहं", "मै ईश्वर हूँ", "वह मै हूँ", मै वह हूँ" ये सभी सिद्धांत बताते हैं कि वो जो अपने आपकी विभिन्न नामो और रूप से अलग अलग करते हैं, वास्तव में स्वयं ईश्वर हैं। यही कारण है कि शास्त्रों में कहा गया है "ब्रह्मवित ब्रह्मैव भवति" (जो ईश्वर को महसूस कर लेता है वह स्वयं ईश्वर बन जाता है)। यह स्वयं में ईश्वर कि पहचान ही वास्तविकता की पहचान है। ~ बाबा |
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