'क्या तुम डॉक्टर हो ?'
प्रिय पाठकों, 'साई सेवा' खंड में हम आपको ऐसी प्रेरक कहानियों से आपको अवगत कराते हैं जो सम्पूर्ण भारत एवं विश्व में सेवा दलों द्वारा किए गए कार्यों से ली गई है । हालाँकि इस बार ये काफी अलग है । यह सेवा पर अधिक आधारित नही होकर एक स्वामी के एक ऐसे यन्त्र पर आधारित है जिसने निस्सवार्थ भावः से अपने समय और ऊर्जा गरीबों और जरूरतमंदों को भेंट किया । ऐसा क्या था जिसने एक नेत्र सर्जन को अमेरिका से हजारों मील दूर हर साल 3 सप्ताह के लिए स्वामी के सुपर स्पेसिलिटी हॉस्पिटल पुत्तापर्थी ले आया? कितना अलग है यह अनुभव?
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डॉ. संजीव दीवान |
2001 में, एक अपने दौरे के दौरान डॉ. संजीव दीवान जो कि केंटन, ओहियो, संयुक्त राज्य अमरीका में नेत्र सर्जन हैं, भजन हॉल के सामने बरामदा में बैठा हुआ बेसब्री से स्वामी के दर्शन के लिए इंतजार कर था । "बाबा बरामदे में चलते हुए आए और गुजरते हुए मेरी ओर देखते हुए कहा 'क्या तुम डॉक्टर हो? तुम एक मरीज हो'" । डॉ. धवन ने कहते हैं "मुझे स्वामी के शब्दों का महत्व पता था । मैंने सर हिलाया और कहा 'हाँ, स्वामी, मैं रोगी हूँ और आप मेरी बीमारी ठीक करेंगे ।
दीवान, श्री सत्य साई इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस, प्रशांतिग्राम में एक 40 वर्षीय विजिटिंग नेत्र सर्जन ये महसूस करते हैं कि वे स्वामी द्वारा अनगिनत तरीकों से जिस बदवाल कि कल्पना कि जा रही है उसे गुना करने आए हैं । हर साल, डॉ. दीवान अमेरिका में अपने व्यस्त प्रक्टिस में से वापस ब्रेक लेकर अपना रुख तीन हफ्ते के लिए SSSIHMS को करते हैं । जहां वे रोगियों का उपचार करते हैं और ख़ुद भी 'ठीक होते हैं' ।
एक सच्चे डॉक्टर की योग्यता
"मैं एक कम्पलीट डॉक्टर नही हूँ । एक डॉक्टर को पूर्णतः निस्वार्थ, इच्छा रहित और अनुकंपाकारी होना चाहिए । यह बदलाव कई तरीकों से होता है " वे मुस्कुराते हुए कहते हैं । एक सुंदर सी मुस्कान, जिसकी गर्मी कठिन समय में भी रोगियों को आराम देती है । उनकी मुस्कान के अलावा, रोगी जैसे ही अस्पताल में उसके कमरे में प्रवेश करते हैं, जो नोटिस करते हैं वह है, एक हंसमुख इन्सान जो बकाइन नीले एप्रन साथ में उनके बाईं ओर ओहियो नेत्र एलायंस की कशीदाकारी । डॉ. दीवान के माता पिता भारत के विभाजन के दौरान पाकिस्तान से भारत चले आए थे । बाद में उनका परिवार 1956 में अमेरिका में बस गया ।
कैसे स्वामी डॉ. दीवान को अपने पास ले आए काफी रमणीय कहानी है । जब वे भगवान के साथ अपनी पहली मुलाकात को याद करने की कोशिश करते हैं तब उनकी तीखी भूरी आँखों में अपनी स्मृति पटल को खंगालते हुए नम होते देख सकते हैं । वे अपना सिर घुमाकर अपने कमरे में दूर से सफेद दीवार उसे देखते हैं ।
“मैं इन विवरणों के साथ इतना अच्छा नही हूँ" , उन्होंने चुप्पी तोड़ते हुए कहा । उन्होंने कहा, हालांकि, 1992 में न्यूयॉर्क में हुई उनकी शादी समारोह में जो समारोह स्थल के स्थान पर रखी एक 'आदमी' की तस्वीर याद है जो उनकी पत्नी ने रखा था । वे कहते हैं "हमारी शादी के दौरान, सीमा ने साई बाबा की तस्वीर वहां रखी थी, जहां शादी की रस्म होनी थी", "'यह आदमी कौन है?' मैंने कहा था। 'मेरे गुरु' उसका जवाब था"।
श्रीमती दीवान जब सात वर्ष की थी तब से बाबा की एक उत्साही अनुयायी रही है । वह कई अवसरों पर पुत्तापर्थी आई और स्वामी के ऊपर अनेक पुस्तकों का लेखन भी किया जिसमे "साई दर्शन" पहला था ।
"मुझे अपनी शादी में साई बाबा की तस्वीर होने के बारे में कोई जानकारी नही थी, लेकिन पता नही क्यों मैं उस 'व्यक्ति' से प्रभावित नहीं था" । दीवान आगे कहते हैं - "हमारी शादी के कई वर्षों बाद एक दिन मेरी पत्नी में मुझसे कहा 'हम भारत जाकर पुत्तापर्थी की यात्रा करते हैं । मुझे महसूस हुआ मैं उसका साथ दे रहा हूँ । लेकिन मैंने कहा 'हम एक ही दिन के लिए आश्रम में रहेंगे क्युकि वंहा हमारे पास और भी अन्य कार्यक्रम होंगे'" ।
ये 1995 था जब डॉ. दीवान पहली बार पुत्तपार्थी आए । "बंगलोर से पुत्तावार्थी जो जोड़ने वाली फ्लाइट से हम पुत्तार्थी एअरपोर्ट पर उतरे ऐसा लगता है जैसे किसी अदृश्य हाथ ने हमारे सभी चिंताओं का ख्याल रखा । जैसे ही हम विमान से निकले, एक व्यक्ति ने आश्रम तक के लिए हमें मार्गदर्शन करने की स्वयंसेवा की । हमने संकोच किया, पर वह हमें भी साथ ले गया और हमारे रहने के लिए पर्याप्त व्यवस्था की । हमें इस आश्रम के अंदर आरामदायक महसूस होने के बाद ही उसने हमें छोडा ।" । उसने हमें बताया कि वह इंडियन एयरलाइंस के साथ काम करता है । बस इतना ही हम उसके बारे में जानकारी इकट्ठा कर सके, डॉ. दीवान ने आगे जोड़ते हुए कहा ।
दिव्य प्यार का आध्यात्मिक आकर्षण
जब भगवान के दर्शन का समय हुआ था, पूरा परिवार जल्दी से हॉल पहुँच गया । "मैं स्वामी से बहुत दूर, कहीं भक्तों की भीड़ में बैठ गया । जैसे ही मैंने स्वामी को भक्तों कि ओर चलते हुए देखा, मैं उन्हें महसूस करने को तैयार हो गया । मुझे कुछ होने लगा । मैं उनके करीब जाना चाहता था । 'क्यों मैं उनके करीब नहीं जा सकता ?', 'यह दुरी क्यों है?', मैंने अपने आप से ये सवाल कर रहा था । उस रात मैं लगभग अंसुओं में था,"- डॉ. दीवान ये कबूल करते हैं । "फिर मैंने सीमा से कहा,'ठीक है, हम दो दिन के लिए और रुकते हैं!'" अब , डॉ. दीवान मुँह दबाकर हंसाने लगे ।
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अगले दिन डॉ. दीवान भगवान के जन्मस्थली गए, जहाँ अब एक शिव मंदिर है और पुत्तापर्थी शहर के एक अंत में निहित है । "हमारी यात्रा के दौरान श्री भट्ट जो मंदिर के पुजारी थे, वे हमे अपने साथ अपने घर पर ले गए और बाबा की कहानियाँ कहना शुरू किए । लेकिन मैं तृप्त नहीं हो पा रहा था । मेरी रुचि को स्वीकार करते हुए, श्री भट्ट एक के बाद एक कहानी कहने लगे । फिर भी मैं और अधिक सुनना चाहता था । " जल्द ही डॉ. दीवान अपने परिवार के साथ अगले पाँच वर्ष तक प्रशांति निलयम की यात्रा करने आते रहे ।
सच्चे दर्शन का उपहार
कई मायनों में, भगवान ने दीवान परिवार की उनके मुश्किल समय में मदद की । डॉक्टर के तीन बेटों में से एक, 12 वर्षीय करन, जो एक आंख में इसोट्रोपिया से पीड़ित था । जिसके आंखों के बदल जाने के कारण आंखों में ऐचा पन दिखाई देता है । इस हालत के कारण, करन चश्में का इस्तेमाल करता था ।
डॉ. दीवान कहते हैं सन् 2000, में उनके परिवार को मिले इंटरव्यू के दौरान, स्वामी उनके 12 वर्षीय चश्माधारी बेटे को देखे और कहे : "लड़के की आँखें कमजोर हैं", उन्होंने कुछ देर रुक के कहा कि, "चश्मे चले जायेंगे" । कभी कभी भगवान के कहने का मतलब समझने के लिए कठिन होता है । लेकिन जल्द ही, डॉ. दीवान स्वामी की असीम कृपा की अभिव्यक्ति के गवाह बने ।
" हम अमेरिका वापस चले गए और एक दिन करन मेरे पास आया और कहा 'पिताजी, जब मै चश्मा पहनता हूँ मुझे सब कुछ धुंधली दिखती है पर बिना चश्मे के सब कुछ साफ' । मुझे लगता है कि वह मज़ाक कर रहा था । मैं पैडीअट्रिक नेत्र विज्ञान में विशेषज्ञ हूँ, तो मै करन को अपने क्लिनिक ले गया और उसकी आँख का परीक्षण लिया । उसकी आँखें एकदम सही थी । वो चंगा हो गया था!" - डॉ. दीवान कहते हैं । उनकी आँखें इस अद्भुत चमत्कार को याद करके खुशी से दमकने लगी । 'जैसा स्वामी ने कहा था, चश्मे गए'," वह उल्लास से कहते हैं ।
स्वस्थ कर देने वाले मन्दिर में कार्य अनुभव
वे कहते हैं - "मैं हमेशा महसूस करता हूँ कि हम सब उनके हाथों में बस उपकरण मात्र हैं । मेरे पास यहाँ के बहुत सारे अद्भुत घटनाओं का अनुभव है । जब मैं पहली बार यहाँ आया तो यह देखकर दंग रह गया कि यह हॉस्पिटल कम और मन्दिर ज्यादा लगता है । ”
अपनी पहली यात्रा के दौरान, विशिष्ट नेत्र विकारों के साथ लोगों की एक बड़ी संख्या, अचानक आ गई जिसके इलाज का डा. दीवान को विशेषज्ञता हासिल है । "यह स्वामी की कृपा है। और यह हर अवसर पर होता है जब कोई विजिटिंग डॉक्टर अस्पताल में आता है।
लोगों को लगता है कि ऐसा संदेश फैलाने के कारण हुआ होगा । कई अवसरों पर जब विजिटिंग डॉक्टर पहली बार दौरा करते हैं तब होता है लेकिन ऐसा कई बार हुआ यह सिर्फ़ संयोग हो सकता है । ”
“साथ ही जब मैं यहाँ आता हूँ, मेरे दक्षता अचानक बढ़ जाती है । मैं कई लोगों के इलाज करने में सक्षम हो जाता हूँ लेकिन घर वापस अमेरिका में जाकर मै दक्षता में कमी होना महसूस करता हूँ । ” डॉ. दीवान मुँह दबाकर हँसते हुए कहते हैं "मुझे विस्वास है यह बाबा की कृपा है!"
वो आगे कहते हैं कई मौको पर ऐसे मामले सामने आए हैं जो कि यु.एस. में प्रेक्टिस के दौरान कभी देखे नही गए । “यहाँ पर मुझे कई दुर्लभ केशों के गहराई पूर्ण अध्यन का अवसर मिला मै अपने साथ इन अनुभवों को यु.एस. वापस ले के जाता हूँ । ”-उन्होंने आगे जोड़ते हुए कहा ।
डॉ. दीवान के अनुसार, यु.एस. के मुकाबले भारत में तंत्रिका पक्षाघात से अधिक मामले मिले हैं । उन्होंने कहा कि तीन तंत्रिकाएँ होती हैं जो आँखों की गतिविधियों पर नियंत्रण करते है, और तंत्रिका पक्षाघात आंखों के असामान्य गतिविधियों के लिए उत्तरदाई हैं । "इस अस्पताल में आने वाले कई मामले इस तरह के होते हैं" , उन्होंने बताया ।
डा. दीवान भी सिखाने की इच्छा रखते है, जो इस बार के SSSIHMS के वर्तमान यात्रा में पुरी हुई । "मुझे पढाने की इच्छा थी और अब स्वामी ने मेरी इच्छा पुरी कर दी ”, उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा । “शिक्षण एक चिकित्सक को चिकित्सा के क्षेत्र में हो रही नवीनतम घटनाओं के साथ बने रहने मे मदद करती है । मुझे उन सवालों के जवाब देने होते हैं जो यहाँ के रेसिडेंट डॉक्टर रखते हैं ,इसलिए मुझे सिखने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है और बाद मे उही उन्हें सिखाता हूँ । यह प्रक्रिया मुझे एक बेहतर चिकित्सक बनने में मदद करती है । ”
एक आकांक्षा शांति के लिए
अपने अन्दर आए परिवर्तन के बारें में, डा. दीवान कहते हैं कि भगवान के साथ उनके अनुभवों ने उन्हें मदद की, साथ ही उनके जीवन के लक्ष्य को नया अर्थ मिला । अब यह लक्ष्य शांति और एकता में बदल गया है । “मैं बातें कम करता हूँ और स्वीकार अधिक करता हूँ - इस तरह बिना इच्छा के सेवा करता हूँ । ”
"मेरे साथियों को यह समझाना मुश्किल है की प्रत्येक वर्ष मैं तीन सप्ताह के लिए कहाँ जाता हूँ । उन्हें लगता है मै समुद्र तट पर घूमने जा रहा हूँ ,"- वह मुँह दबाकर हंसते हुए कहते हैं । वे आगे कहते हैं "उनके लिए ये कल्पना करना मुश्लिक है की मै एक अस्पताल में स्वयंसेवक के रूप में जाता हूँ , जो कि भारत के एक सुदूर कोने में स्थित है और वहां रोगियों का मुफ्त उपचार होता है" ।
डॉ. दीवान अपने साथियों को समझाने की कोशिश करते हैं और उनसे कहते हैं की यह एक छुट्टी पर जाना नही है बल्कि एक अनुभव है जिससे एक व्यक्ति एक अलग स्तर पर पहुचता है । वो कहते हैं जब उन्होंने अस्पताल का दौरा शुरू किया तब उन्हें इस बात का अहसास हुआ कितने लोग उनके द्वारा किए जा रहे काम की सराहना करते हैं । वे आगे कहते हैं "और वास्तव में मेरे द्वारा की जा रही सेवा अपने आप में उच्च पुरुस्कार के समान है"।
भगवान द्वारा डॉ. दीवान और उसकी पत्नी, सीमा को दिए गए एक इंटरव्यू के दौरान डॉ. दीवान ने स्वामी से पूछा , "आपके और मेरे बीच ये दुरी क्यों हैं?" "कोई अलगाव नही, कोई दुरी नही" भगवान् ने इस बात की पुष्टि की ।
“भगवान के पास आने से पहले मुझे ये पूछने की आदत थी । ‘हे भगवान, तुम कहाँ हो?’ मै अब ये सवाल नही पूछता । ”, डॉ. दीवान ने एक संतुष्ट मुस्कान के साथ बातचीत समाप्त की और उस काम में लग गए जो उन्हें सबसे ज्यादा प्यारी है । – स्वामी के अस्पताल में रोगियों की सेवा ।
- SaiSmriti Team